क्या होते हैं ये सपने ?

सपने। हाँ सपने ! जो इंसान देखता है। खुली आँखो से। हाँ वही सपने, जो मन को व्याकुल भी करता है, और शायद शांत भी!

 एक आस होती है, शायद उसके पूरे होने की। हाँ वही सपने, जो शायद लाचारी में भी साथ नहीं छोड़ती। एक ज़िद है शायद वो। 

सुना था, डूबते को तिनके का सहारा होता है, पर देखा है, टूटे को सपने का आसरा होता है। 

हाँ वही सपने, जो तुमने भी कभी देखा होगा, शायद कुछ पाने को, शायद कुछ ना खोने को। 

फिर हुआ क्या ? क्यूँ होने दिया ओझिल उसे ? हिम्मत नहीं बची होगी शायद ! क्या है ये हिम्मत ? क्यूँ टूटती है ये


शायद मुश्किलें बड़ी होती होगी सपनो से। ऐसा है क्या ? ना, शायद नहीं। मुश्किलें तो छनभंगुर होती है, सपने तो अमर होते हैं। 

फिर क्या हुआ ? शायद इंसान भटक जाता होगा। ऐसा है क्या ? ना, शायद नहीं। सपने हीं तो राह बतलाते हैं, फिर भटकना कैसा


शायद जो तुमने देखे थे, हाँ खुली आँखो से, वो कुछ और था। वो सपने तो नहीं हो सकते, शायद एक धुँध होगी। दूरदर्शिता नहीं रही होगी शायद। 

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